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रोटी जो जुटा न पाते

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02 Jun '24
1 min read


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रोटी की खुशबू से बढ़कर

खुशबू अन्य न होती।

रोटी की तलाश में दुनिया

भार दुखों का ढोती।।

रोटी जिन्हें नहीं मिलती वे

जाने क्या क्या करते।

रोटी जिन्हें सुलभ है वे भी

करते पाप न डरते।।

रोटी जो न जुटा पाते वे

कहते- किस्मत खोटी।

हे प्रभु! कोई रहे न वंचित

मिले सभी को रोटी।।

अन्न न हम बर्बाद करेंगे

आओ शपथ उठाएँ।

क्षुधित न रहे पड़ोसी अपना

उसे खिलाकर खाएँ।।

महेश चन्द्र त्रिपाठी

Category:Poem


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Written by Mahesh Chandra Tripathi