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प्रेम वासना नहीं उपासना है

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24 May '24
8 min read


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बात सन 2005 जुलाई - अगस्त की है मैं बी. ए. प्रथम वर्ष का छात्र था । मैं उस वक्त एक व्यक्ति के घर उनके बच्चों को होम ट्यूशन पढ़ाया करता था ।  एक सांवली सी लड़की जो मेरे ही कॉलेज से बी. ए. कर रही थी वो भी उनके घर कभी कभी आई करती थी । शुरू में एक दो बार तो उससे मेरी कोई बात नहीं हुई परंतु कुछ दिनों बाद वो घुल मिल सी गई बात चीत भी होने लगी । वो जब भी कॉलेज जाती थी यदि मैं दिख जाता तो साइकिल से उतरकर प्रणाम अवश्य करती । एक दिन मौका पाकर मुझे एक  पन्ना देते हुए बोली इसको मौका मिले तो पढ़ लेना ।

मैं उस पन्ने को चुप चाप अपने शर्ट की जेब में रख लिया । बाद में उसको देखा और पढ़ा तो उसमें ढेर सारी प्यार भरी बातें लिखी हुई थी और कई सारी शायरी लिखी हुई थी। एक पंक्ति ही मुझे अब याद है। 

    सागर में जल इतना गागर में भरा न जाय ।

   दिल में बातें बहुत हैं खत में लिखा न जाय ।।

बाकी और कुछ मुझे नहीं याद । अगले दिन मैं जब कॉलेज गया तो वो फिर मिली और मुझसे पूछी कि देखे पत्र को तो मैने कहा कि नहीं समय नहीं मिला कई दिन इसी तरह चलता रहा एक दिन गुस्से में वो बोली कि आज जरूर पढ़ लेना मैंने कहा कि ठीक है आज अवश्य पढ़ लूंगा । अगले दिन जब उसने पूछा कि आज पढ़े हो तो मैने जवाब दिया कि क्या प्राचार्य महोदय से प्रमाणित करवाना है या किसी और से तो उसने बोला कि दिल विल है कि नहीं तुम्हारे पास ..... तो मैने जवाब दिया कि दिल तो कुत्ते, बिल्ली , भेड़, बकरी , पशु , पक्षी, किट पतंगी सबके पास होता है। इतना सुनते ही वो जर जरा गई गुस्से में बोली कि मैं तुमसे प्यार करती हूं। तो मेरा जवाब था कि इसमें कौन सी बड़ी बात है प्यार तो हर कोई करता है भाई - बहन का प्रेम, बाप - बेटे का प्रेम पति - पत्नि का प्रेम , इत्यादि ढेर सारा प्रेम का उदाहरण दिया तो वो बोली मैं कुछ नहीं जानती उस पत्र का जवाब मुझे चाहिए । फिर मैंने उसको समझाया कि ए बताओ यदि तुम्हारे जैसी और भी लड़किया मुझसे प्रेम करने लगें और इसी तरह से पत्र देने लगे तो मैं सबका ज़बाब कैसे दे पाऊंगा ।प्रेम जताने के लिए पत्र थोड़ी ही जरूरी होता है। खैर वो समझ गई । समय का पहिया अपने गति से चलता रहा बात चीत चलती रही हाल चाल होता रहा इसी क्रम में पता चला कि उसके पास कोई भाई नहीं है तो मैने कहा कि तुम मुझे भाई बना लो। उसने कहा नहीं । परंतु वो मेरे लिए समर्पण का भाव रखी थी ।

कहा गया है कि

प्रेम समर्पण भाव है, प्रेम नहीं कोई खेल।

बिना प्रेम संभव नहीं, देव मनुज का मेल ।।

खैर मैं भी उसके संस्कार से बहुत प्रभावित अब उसके घर भी मैं अपने मित्र जो कि पेशे से चिकित्सक हैं उनके साथ गया । उसके मां, पिता जी से बात हुई वे लोग भी मुझसे बहुत प्रभावित हुए और मेरा सम्मान भी खूब करते थे। ऐसे ही समय बीतता गया मेरे मित्र के मोबाइल से मैं उससे बात भी करने लगा । क्यूंकि मेरे पास मोबाइल नहीं था । कुछ महीने बाद मैंने उससे पूछा कि तुम कहीं भी मुझे प्रणाम करती हो तुम्हें नहीं लगता कि लोग क्या सोचेंगे ? मेरे ऐसा कहने का कारण था कि हम दोनों लगभग हम उम्र ही थे। तो उसने जवाब दिया कि मैं आपसे प्रेम करती हूं। मैं थोड़ा सा सहम गया ए भी क्या गजब का प्रेम करने का तरीका है तो उसने कहा कि हम राधा और मीरा की तरह आपसे प्रेम करते हैं वासनात्मक प्रेम नहीं खैर कुछ दिनों तक ऐसा चलता रहा। फिर घर आना जाना शुरू हुआ बात चीत शुरू हो गई मैंने भी फोन ले लिया। लंबी लंबी बाते होने लगी उसके मां, पापा और बहन सभी से बात होने लगी। अब जब भी मुझे समय मिलता मैं उसके घर चला जाता। 

वे लोग भी जब कुछ बनाते तो मुझे खाने पर अवश्य बुलाते । मेरा भी आना जाना शुरू हो गया। कभी कभी रात्रि विश्राम भी कर लेता । इस तरह काफी समय तक चलता रहा टिफिन भी आने लगी । अब मैं भी उसकी तरफ आकर्षित होने लगा । बात न होने पर मुझे भी अजीब सा लगता। अब मैं प्रतिदिन एक बार दो से तीन मिनट अवश्य बात करता उससे ज्यादा नहीं क्यूंकि उस समय मोबाइल में फ्री कॉल नहीं होती थी 10 ₹ का रिचार्ज कराने पर 7₹ मिलते थे उसी रिचार्ज से हफ्ते भर काम चलाना पड़ता। कुछ पैसा मिसकॉल के लिए भी मोबाइल में रखना पड़ता । यही क्रम चलता रहा फिर एक दिन वो बोली घर वाले मेरी शादी के लिए लड़का ढूंढ रहे हैं। मैने बोला कर लो तो वो बोली कि नहीं जब तक स्नातक पूर्ण नहीं कर लूंगी तब तक शादी नहीं करूंगी । ये बात उसने अपनी मां से भी बताई । फिर घर वाले मान गए । उसके बाद वो मेरे पीछे पड़ गई और जिद्द करने लगी कि मैं शादी आपसे ही करूंगी । मैं परेशान हो गया बोला कि अंतर्जातीय विवाह मेरे लिए ठीक नहीं रहेगा । यदि मुझे अंतर्जातीय विवाह करना होता तो मैं 2003 में मुंबई छोड़ कर नहीं आता और आज करोड़ों का मालिक रहता । बाद में उसके मां पिता सब लोग कहने लगे तमाम तरह के उदाहरण भी देने लगे । फिर मैं भी कुछ लोगों से राय लिया तो लोगों ने बताया कि कर लो क्षत्रिय कन्या ही तो है और कन्याओं की कोई जात नहीं होती । मेरा भी हृदय परिवर्तित हो गया मैं भी बोला ठीक है बाद में जो होगा देखा जाएगा और विवाह के लिए तैयार हो गया परंतु स्नातक के बाद । उसके बाद मिलना जुलना घूमना फिरना शुरू हो गया और मेरा भी मन परिवर्तित हो गया चलो कोई बात नहीं खेत बारी तो ठीक ठाक ही है इसके पास उसी से अपना भी काम चल जाएगा । क्यूंकि मेरे पास तब भी कोई ज़मीन जायदाद नहीं थी और आज भी नहीं है ।

सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था परंतु ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था। मेरी मोबाइल खो गई और 

किसी कारण वश मुझे कुछ महीनों के लिए बाहर जाना पड़ा तो कोई बात चीत उससे नहीं हुई ।वापस आने के बाद मेरे मित्र के मोबाइल पर उसका फोन आया मुझसे बात करने के लिए बोली मैं बात किया तो उसने कहा कि मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं मर जाऊंगी तो मैने उसे समझाया कि अरे क्या फालतू की बात कर रही हो इस तरह की बात मत करो और न ही कोई गलत कदम उठाना तो उसका जवाब था कि मैं कोई गलत कदम नहीं उठाऊंगी । फिर लगभग 15 दिनों बाद उसका फोन आया कि आज मैंने स्वप्न देखा है कि मुझे सांप ने काट लिया है और मैं मर गई हूं इतना सुनते ही मैंने बोला कि तुम बार बार मरने की ही बात करती हो तो तुम मुझे फोन मत करना उसके बाद उसने प्रणाम किया और बोली की आशीर्वाद दे दीजिए आज के बाद शायद मैं आपसे आशीर्वाद न ले पाऊं। फिर भी मैं होनी को नहीं समझ पाया और फोन काट दिया। उसके कुछ दिन बाद मैं और मेरे डॉक्टर मित्र दोनों लोग उसके गांव के तरफ से कहीं जा रहा थे जब गांव के पास पहुंचे तो मित्र ने बोला कि दूबे जी एक बार फोन कर लीजिए बहुत दिनों से उसने फोन नहीं किया । जब फोन किया गया तो उसके पिता जी ने बताया कि गुरु जी वो तो कल ही मर गई। उसको सर्प ने कांट लिया । सर्प की बात तो लोगों के माध्यम से सुनने को मिला लेकिन मुझे ए पता नहीं चल पाया कि सर्प ने उसको ही काटा है। उसके बाद हम दोनों लोग उसके घर गए मन में बहुत दुःख हुआ। परंतु किया ही क्या जा सकता है। इस तरह मुझसे प्रेम करके जीवन भर साथ देने के लिए तैयार होने वाली इस संसार से विदा हो गई और मेरा प्रेम अधूरा ही रह गया। आज भी मन उसे यादकर बहुत दुखी हो जाता है। 

क्यूंकि उसने प्रेम की एक नई परिभाषा मुझे बता दी । 

 

“प्रेम में एक वस्तु भी जीवंत हो उठती है जबकि वासना में एक सजीव प्राणी भी केवल एक वस्तु बन जाता है।”

 

वो तो इस जहां से चली गई परंतु आज भी जब कभी प्रेम की बात होती है तो उसकी स्मृति अनायास ही हो जाती है क्यूंकि उसने मुझे बता दिया कि

' प्रेम वासना नहीं उपासना है ।’

 

Category:Literature


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Written by Shatrughan Dubey