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भारत की धरती तक कैसे पहुंचा था वास्को डी गामा ?

जिसे ढूंढते-ढूंढते कोलंबस ने अमेरिका खोज लिया, वहां तक कैसे पहुंचा वास्को-डा-गामा ?

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15 Aug '23
8 min read


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भारत अपनी तीन चीज़ों के लिए इतिहास में बहुत प्रसिद्ध रहा है। यहाँ की बेहिसाब संपत्ति, ज्ञान और मसाले पूरी दुनिया को अचरज में डालते रहे हैं। इतिहास की किताबों में ये वर्णन मिलता है कि भारत बड़ी मात्रा में मसालों का निर्यात करता था, और विश्व के अधिकतर राष्ट्र मसालों के लिए भारत पर ही आश्रित थे। भारत की इन्हीं विषेशताओं के कारण समय-समय पर बहुत से विदेशी यहाँ व्यापार करने के उद्देश्य से आते रहे हैं। इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए अंग्रेज भी भारत आये थे, जिसके कारण देश को सालों की ग़ुलामी भुगतनी पड़ी। 

Vasco Da Gama ( Image Source : Pixabay/Ntguilty)

                                                 

वास्को डी गामा भी ऐसा ही एक यात्री था, जिसने व्यापारिक कारणों से भारत की यात्रा की। लेकिन वास्को डी गामा की यात्रा को भारतीय इतिहास में एक बहुत महत्त्वपूर्ण घटना के तौर पर जाना जाता है। यह भारत के साथ-साथ पूरे विश्व के लिए भी एक महत्वपूर्ण घटना थी। 

लेकिन ये घटना इतनी महत्त्वपूर्ण थी क्यों, और आखिर, वास्को डी गामा भारत पहुंचा कैसे था, इस लेख में आप इसी बात को जानेंगे। 

पश्चिमी देशों में भारतीय मसालों की ज़बरदस्त मांग !

पुर्तगाल, स्पेन समेत अन्य यूरोपीय देशों में भारत के मसालों की ज़बरदस्त मांग थी। ये मसाले आमतौर पर रेशमी मार्ग जिसे सिल्क रूट भी कहा जाता है, के रास्ते भारत से यूरोपीय देश पहुंचाए जाते थे। साल 1453 में तुर्की के क्षेत्र में एक बड़ा साम्राज्य उभर कर आया।

ये साम्राज्य था, ऑटोमन ( उस्मानी ) साम्राज्य। उस्मानियों की नज़र एशिया और यूरोप के बीच हो रहे व्यापार पर पड़ी। इसका नतीजा यह निकला कि जिस रास्ते से भारत के मसाले व अन्य सामन यूरोप पहुंचाए जाते थे, उस रास्ते को उस्मानियों ने बंद कर दिया। इससे एक ओर अरबी लोगों का फायदा हुआ, तो दूसरी ओर यूरोपीय लोगों का बेहद नुकसान। 

सिल्क रूट के रास्ते किये जाने वाला सारा व्यापार ऑटोमन साम्राज्य के नियंत्रण में हो गया था। एशिया से यूरोप जा रहे सामान पर बहुत अधिक कर ( टैक्स ) लगाया जाता था। इससे अरबियों को काफी लाभ पहुंचता था, लेकिन यूरोपीय देशों के लिए मसालों का आयात करना महंगा सौदा हो गया था। साथ ही साथ यूरोप को इस बात से आपत्ति थी कि एक गैर ईसाई राज्य के हाथों इस व्यापार और उसके लाभ को नियंत्रित किया जाए।  

अब ज़मीनी रास्ते पर तो अरबियों का नियंत्रण था, नतीजतन यूरोप के राजाओं ने समुद्र के रास्ते भारत पहुँचने का निर्णय लिया। उस वक्त यूरोप भारत पहुँचने के समुद्री मार्ग से अनजान था।  इसके अलावा पहले विश्व का कोई सटीक मानचित्र भी नहीं था, जिसे देख नाविक रास्ते का अंदाज़ा लगा सकें। राजाओं को जानकारी के नाम पर केवल इतना ज्ञात था कि भारत पूर्वी क्षेत्र में स्थित है। अब आवश्यकता थी हुनरमंद और अनुभवी नाविकों की, जो भारत का समुद्री मार्ग ढूंढ सकें। 

Christopher Columbus ( Image Source : Pixabay/Gordon Johnson)

शुरू हुआ यात्राओं का दौर !

भारत और चीन पहुँचने के रास्ते को खोजने के लिए विभिन्न राजाओं ने नाविकों को तैयार करना शुरू कर दिया। नाविकों और अन्वेषकों का पहला महत्त्वपूर्ण जत्था स्पेन के द्वारा भेजा गया, जिसका नेतृत्व कर रहे थे इतालवी अन्वेषक क्रिस्टोफर कोलंबस। 

3 अगस्त 1492 को क्रिस्टोफर कोलंबस ने भारत के लिये अपनी यात्रा शुरू की थी।  कोलंबस के साथ यात्रा में तीन जहाज और लगभग 90 नाविक थे। कुछ समय तक यात्रा शांत रही, लेकिन अटलांटिक महासागर में आये भयानक तूफ़ान के कारण रास्ता भटक गए। बहुत समय तक चारों और समुद्र ही दिखाई देता रहा, लेकिन कोलंबस को ये उम्मीद थी कि वे अंततः भारत पहुँच जाएंगे। 12 अगस्त 1492 को कोलंबस को ज़मीं दिखी। वे एक कैरेबियाई द्वीप पहुँच चुके थे। वहां के सांवले आदिवासियों को देख कर कोलंबस समझे कि वे भारत पहुँच चुके हैं। 

उन्होंने वहां कई और द्वीप भी ढूंढ निकाले और भूलवश उन्हें "इंडीज" नाम दिया। बाद में ये निष्कर्ष निकला कि क्रिस्टोफर कोलंबस द्वारा ढूंढा गया भूभाग भारत नहीं था। बाद में कोलंबस द्वारा खोजे गए क्षेत्र को अमेरिका नाम मिला, और इस तरह अमेरिका वैश्विक राजनीति में अस्तित्व में आया। 

भारत ढूंढो अभियान में पुर्तगाल हुआ शामिल 

यूरोप जिस स्थिति में पहले था, वापस उसी स्थिति में आ गया था। यह साफ़ हो चुका था कि कोलंबस द्वारा ढूँढा गया क्षेत्र भारत नहीं है। इसी बीच साल 1481 में जॉन द्वितीय के हाथों पुर्तगाली सत्ता की कमान आ गयी। जॉन द्वितीय जिस वक्त पुर्तगाल की राजगद्दी पर आसीन हुआ था, उस समय वहां का राजकीय कोष खाली हो गया था।  वजह भी वही, अरबियों द्वारा मसालों के आयत पर लगाए जाने वाला भरी कर। जॉन द्वितीय ने अपने दो विश्वस्त जासूसों को भारत पहुँचने के ज़मीनी मार्ग के बारे में जानने भेजा और एक जासूस को समुद्री रास्ते का पता लगाने अफ्रीका रवाना किया। 

वह जासूस अफ्रीका के आखिरी छोर तक पहुँच गया, जिसे केप ऑफ़ गुड होप कहा जाता है। उस जासूस ने राजा को यह सूचना दी कि अफ्रीका के दक्षिणी छोर तक पहुँचने के बाद समुद्री मार्ग उत्तर पूर्व की दिशा की ओर जाता है। राजा को ये उम्मीद जागी कि वह समुद्री मार्ग भारत की तरफ ही पहुंचता होगा। 

साल 1495 में मेनुएल प्रथम पुर्तगाल के राजा बने। उन्होंने विश्वस्त और अनुभवी नाविकों कि खोज शुरू कर दी, जो इस जोखिमों से भरी यात्रा को सफलतापूर्वक पूरा कर सकें। राजा की यह खोज आखिर सफल हुई और उन्हें वास्को डी गामा का साथ मिला, जिसने इस यात्रा को ना सिर्फ पूरा किया बल्कि भारतीय इतिहास को बदल कर रख दिया। 

वास्को डी गामा : परिचय व भारत यात्रा

वास्को डी गामा एक पुर्तगाली नाविक थे जिनके जन्म पर इतिहासकारों में मतभेद है। फिर भी अधिकतर इतिहासकारों का यह मानना है कि वास्को डी गामा का जन्म 1460 से 1470 के बीच हुआ था। इनके पिता शाही दुर्ग में कमांडर के पद पर तैनात थे। उनकी नाविकी में ख़ास रूचि थी, एवं उस समय के तमाम बड़े नाविकों द्वारा उन्हें समुद्र के बारे में बहुत सा अनुभव और जानकारी प्राप्त हो चुकी थी। 

वास्को डी गामा अपनी भारत यात्रा के लिए पुर्तगाल से रवाना हुए। उनके साथ चार जहाज, लगभग 170 आदमी और खूब सारा खाने-पीने का सामन भी था। इतना सामान रखने की वजह यह थी कि कोई नहीं जानता था कि यात्रा कितनी दुर्गम होगी और कितने समय बाद वे सब भारत पहुँच सकेंगे। 

करीब छह महीने की अवधि में वास्को डी गामा अफ्रीका के अंतिम छोर तक पहुँच गया था। यहां तक की जानकारी उसे पहले से ही पता थी, लेकिन आगे का रास्ता उसके लिए अनजान था। यहां से उत्तर पूर्व की यात्रा शुरू करते हुए वह मोज़ाम्बिक और उसके बाद मोम्बासा द्वीप पहुंचा जहाँ उसके साथ अच्छा बर्ताव नहीं किया गया। 

वहां से वास्को डी गामा मालिन्दी द्वीप पर पहुंचा, जहां पर उसका स्वागत किया गया। यहाँ के एक व्यापारी ने वास्को को भारत पहुँचने का रास्ता बताया जिसके बाद वह वहां से भारत की ओर रवाना हो गया। 

Vasco Da Gama Arrival at Calicut ( Image Source : Wikimedia Commons )

भारत की धरती पर वास्को डी गामा का आगमन

वास्को डी गामा 20 मई 1498 में कालीकट के तट पर पहुंचा। भारत तक का समुद्री रास्ता खोजने का पुर्तगालियों का लक्ष्य पूरा हो गया था। और अब आवश्यकता थी मसालों की खरीद फरोख्त का नियंत्रण अरबी लोगों के हाथ से छुड़ाकर यूरोपीय राज्यों को मिलने की। 

पुर्तगालियों ने जब पहली बार कालीकट के निवासियों को देखा, तब उनका वर्णन उन्होंने कुछ इस तरह से किया था।  

सांवले रंग के लोगों के बड़े बाल और बड़ी दाढ़ी हैं। कुछ लोग अपना सर मुंडवाए हुए हैं। ये लोग अपने कान छिदवाकर उसमें सोना पहनते हैं। ये कमर तक कुछ भी नहीं पहनते और कमर से नीचे बहुत ही महीन कपड़ा (धोती) पहनते हैं। यहां की महिलाऐं छोटी और बदसूरत हैं और बहुत सारा सोना पहनती हैं। सभी लोगों का अच्छा स्वभाव है। 

कालीकट में उस वक्त किसी स्थानीय राजा का शासन था, जिसे पुर्तगालियों ने अपने दस्तावेजों में ज़मोरिन कहा है। ज़ामोरिन के दरबार में वास्को डी गामा ने उपहार के रूप में टोपियां, चीनी, कपडे का थान, तेल और शहद के पीपे दिए। राजा ने जब देखा कि उसे सोने चांदी की जगह मूल्यहीन वस्तुएं दी जा रहीं हैं तो उसे बहुत निराशा हुई।

राजा ने वास्को डी गामा को कारावास में डलवा दिया। वहां से बचकर जब वह वापस पुर्तगाल पहुंचा तो उसने पुर्तगाली राजा की मदद से बड़ा जंगी बेडा तैयार किया और भारत पहुँच कर यहाँ के राजा से मसालों का अच्छा-ख़ासा हिस्सा लेकर पुर्तगाल रवाना हुआ। पुर्तगाल में वास्को डी गामा का बहुत सम्मान और स्वागत किया गया। साथ में मसालों द्वारा उसे बहुत मुनाफा भी हुआ। 

आगे के कुछ सालों में दो तीन बार वह फिर से भारत आया था, जिसके बाद से भारत के पश्चिमी क्षेत्र में पुर्तगाली उपनिवेश की स्थापना हो गयी। साल 1529 में भारत में ही उसकी मृत्यु हो गयी कर अस्थियों को बाद में पुर्तगाल भेज दिया गया।

इस यात्रा का भारतीय इतिहास पर क्या प्रभाव पड़ा ?

इस यात्रा के बाद कई यूरोपीय देश भारत व्यापार के लिए आने लगे। पहले पुर्तगालियों ने भारत में अपने उपनिवेश स्थापित किये, उसके बाद फ़्रांसिसी, डच और अंत में अंग्रेज आये। साल 1600 में भारत में “ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी” की स्थापना हुई और साल 1800 आते-आते भारत की सत्ता पर अंग्रेजों का कब्जा हुआ। इस अवैध और निरंकुश अंग्रेजी शासन को कई वर्षों के संघर्ष के बाद साल 1947 में उखाड़ दिया गया और भारत को अंग्रेजों की ग़ुलामी से आज़ादी प्राप्त हुई। हालाँकि सबसे पहले आये पुर्तगालियों ने सबसे आखिर में देश छोड़ा। आज़ादी के बाद भी पुर्तगालियों ने गोवा को अपने कब्ज़े में रखा हुआ था, जिसे आखिर में साल 1961 में छुड़ाया जा सका।  

Category : Travel


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Written by Rishabh Nema