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हिकायत ए हियात

हिकायत ए हियात

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12 May '24
1 min read


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लब पे कोई हिकायत ए हियात ना आयेगा

खमयाज़ा जिन्दगी का यूं ही गुज़र जायेगा।

ज़रूर कोई माज़ी रही होगी सालिम ए माह की

वर्ना यूं ही किसी को दाग़ ए माह नज़र ना आयेगा।

वो भी क्या पल थे

हम कोई खता करते सब तब्बसुम ए लब होते

अब कोई शरारत भी करू तो सबका रवईया बदल जायेगा।

बरसों से करती रही माही खाहिश ए मोहब्बत भरी नज़र की

नज़र जो आया अक्स ए मोहब्बत का ख़ैर वो भी चला जायेगा।

माही ✍️

Category : Poem


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Written by Mahi