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अलविदा

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20 May '24
7 min read


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अलविदा 

 

जिंदगी को अच्छे से  जीने की जब भी सोचा तो रास्ते बहुत कठिन निकले।कभी पड़ोसियों से झगड़ा,तो कभी परिवार में झगड़ा। कभी खुद को कंसन्ट्रेट नही कर पाया।यहाँ एक बात मैंने और सीखी "आप दुनियाँ में हर किसी को खुश नहीं रख सकते"। इस लिए दुनिया की परवाह करना छोड़ देना चाहिए।सच कहूं तो जीवन जीना इतना आसान नही है।अगर जिंदगी जीना इतना आसान होता तो बहुत सारे दार्शनिक,चिंतक,विद्वान "जीवन जीने की कला "पर किताबें नहीं लिखते।
ऐसा नहीं की सारे लोग एक जैसे ही होते हैं ।जिस तरह से पेड़-पक्षियों में,जीवो में,विभिन्नता है वैसे ही इंसानों में भी विभिन्नता है।बनावट की दृष्टि से हम भले ही सामान हो लेकिन सोच में हम कभी सामान नही हो सकते हैं।

मेरा सफ़र एक मजदूर परिवार से शुरू हो कर यूनिवर्सिर्टी के खूबसूरत कैम्पस से टकरा के अखबार के पेज नम्बर 4 से गुजरता हुआ गांव के खेतों की पगडंडियों पर आकर हिचकोले खाने लगा था।
कभी अखबार के दफ्तर से काम खत्म कर के रात के 12 बजे चौराहे की नुक्कड़ पर लगे टी स्टाल पर कुल्हड़ में चाय पीने वाला लड़का अब शाम 8 बजे सो जाता है और सुबह 5 बजे जग कर अपने खेतों पर जी तोड़ मेहनत करने लगा है।

जिंदगी सच में बदल गयी थी मेरी ....खुद के लिए......  जिसमे अब प्रेम के  प्रति कोई संवेदना नही रही गयी थी।
सच कहूं तो किरन के छोड़ जाने के बाद मै टूट सा गया था ,

किरन .........मेरी जिंदगी,मेरा प्यार ,मेरा सब कुछ जिसके बिना सांसे भी चलना बंद कर दे। किरन और मै अखबार के  दफ्तर में साथ काम करते थे ।मै एडिटोरियल डिपार्टमेंट में था और किरन मार्केटिंग डिपार्टमेंट देखती थी।
अखबार के पन्नो में खोए हुए किरन कब दिल के करीब आ गयी पता ही नही चला ।होश तब आया जब किरन का ट्रांसफर दिल्ली से जयपुर  हो गया ।
दिल्ली से जयपुर ज्यादा दूर तो नही था मगर किरन के जाने के बाद ऐसा लगा जैसे हजारो किलो मीटर दूर हो गया  हो।
किरन के लिए मै इतना पागल हो गया था कि मुझे इतना भी याद नही रहा  कि मेरी खुद की कितनी  जिम्मेदारियां हैं जिन्हें बहुत दूर छोड़ आया हूँ। दो छोटी बहनों की शादी और माँ को एक सुकूँन भरी जिंदगी देना मेरा सपना था जो अब बिलकुल भी भूल चुका था। हर महीने माँ को मनीऑर्डर कर देना ही मेरा इकलौता कर्तव्य भर रह गया था। 
रात भर किरन से फोन पर बातें करने के कारण मै रोज सुबह ऑफिस लेट हो जाता।पहले तो बॉस ने इग्नोर किया मगर ज्यादा दिन तक नही ।आखिर एक दिन बॉस ने मुझे वार्निंग दे ही डाली।और फिर...... मैने जॉब छोड़ दी।
दूसरे दिन मै जयपुर किरन के पास पहुँच गया ।किरन मुझको सामने पा कर फूली न समायी।मेरे लिए किरन को सामने पा कर ऐसा लगा जैसे
रेगिस्तान में प्यासे को पानी मिल गया हो। मेरे वो दिन जब मै किरन के पास था मेरी अब तक की जिंदगी के सबसे खूबसूरत दिन थे।
कब दिन गुजरता और कब रात आती मुझे खबर ही नही होती । किरन भी उतनी ही खुश थी ।मगर यह ज्यादा दिन नहीं चला ।जब किरन को पता चला की मैंने जॉब छोड़ दी है तो वह शॉक्ड हो गयी थी।दिन ब दिन उसके व्यवहार में परिवर्तन मुझे दिखने लगा था । किरन का मेरे प्रति सौतेला व्यवहार समझ तो मैं भी रहा था मगर उसके सामने न समझने की एक्टिंग कर रहा था। आखिर एक दिन किरन ने खुद कह ही दिया"" तुम अपने गॉंव कब जा रहे हो?""
"""गॉंव ...? "मैं चौकं गया 
""हाँ ..क्योंकि अब आपकी जॉब तो रही नही ,और मै ज्यादा दिन तक तुम्हारा खर्च नहीं उठा सकती"।
किरन का यूँ मुझ पर तंज कसना जाने क्यों मुझे अच्छा नहीं लगा।
मैंने किरन से कुछ नहीं कहा और चुपचाप  अपना सामान पैक किये बिना ही वहां से बाहर निकल आया। किरन ने मेरी तरफ देखा भी नहीं। मैंने पहली बार जाना था कि" जब गरीबी कमरे में दाखिल होती है तो इश्क़ खिड़की से रफूचक्कर हो जाता है"। कुछ ऐसा ही मेरे साथ हुआ था।

रेलवे स्टेशन पर पहुँचा तो मेरे जेब में  केवल बैंक ATM था जिसमे महज़ कुछ रुपये ही बचे थे।ट्रेन के 
4 घंटे के सफ़र में मैंने किरन के सिवा कुछ और नहीं सोचा।
यूँ तो दिल्ली का कनॉट प्लेस मेरे लिए अनजाना नहीं था मगर उस दिन ऐसा लग रहा  था जैसे हर विल्डिंग मुझे हारे हुए जुआरी की तरह देख कर ठहाके लगा रहीं हो।
अपने अपार्टमेंट में आया तो ऐसा लगा जैसे उसकी छतें मुझे घूर रहीं हो। और दीवारे चीख -चीख कर कह रही हो कि अब तुम बेकार हो ,किसी काम के नही हो।

और फिर अगले दिन सच में मै अपने गांव के लिए निकल पड़ा। 12 घंटे के बाद जब मै अपने गांव के पगडंडियों से होते हुए गुजर रहा था तो अपने चारो तरफ सरसो के पीले फूल और फैली हुई खूबसूरत हरियाली को देख कर ऐसा लगा जैसे मेरा बचपन फिर से लौट आया हो।मै खुद को रोक नही पाया।खेतो के बीच बनी पगडंडियों पर दौड़ने लगा और फिर जो हुआ उसे किरन ही नहीं बल्कि पूरी दुनियाँ ने देखा।

मै ने अपने गांव की बैंक से लोन लिया और डेयरी का व्यवसाय अपनाया।इस व्यवसाय में मैंने अपने पुराने दोस्तों को भी शामिल किया।और मेरा यह कदम सफल रहा।कुछ ही सालों में मैंने और जमीनें खरीदी। दोनों बहनों की शादी की।डेयरी का व्यवसाय मैंने अपने दोस्तों के हवाले कर के 
एक बार फिर मैंने दिल्ली का रुख कियाऔर अपनी मां के नाम से मैंने "गायत्री पब्लिकेशन "नाम से आर्गेनाइजेशन स्थापित किया। मैंने अपने अखबार के दफ्तर के दोस्तों को एक साथ एकत्रित किया।और उनकी सहायता से पब्लिकेशन का काम शुरू किया। जिसमें मुझे ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी। 
एक दिन जब मै अपने ऑफिस में बैठा पुराने राइटर्स की लिस्ट देख रहा था तो मेरे ऑफिस पिउन ने बताया कि  जॉब के लिए किसी ने अपना बायोडाटा दिया है। मैंने बायोडेटा ओपन किया तो मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था
सामने किरन का  बायोडेटा था ।मैं बगैर कुछ सोचे ही नीचे दिए गए नम्बर पर फोन लगाने लगा मगर .....फिर अचानक से रुक गया।
मैंने अपने चपरासी को बुलाया और कहा कि"" इस नम्बर पर कॉल कर के बता देना कि मंडे से ऑफिस ज्वाइन कर ले"।
और ऐसा ही हुआ। किरन को मेरी ऑफिस में काम करते हुए 6 माह से ज्यादा हो गए थे।वह मार्केटिंग हेड थी।लेकिन उसे मेरे बारे में कुछ भी पता नही था। मैंने एक बार फिर अपनी पब्लिकेशन कंपनी अपने दोस्तों के हवाले कर के मै अपने गांव लौट आया।हाँ कभी कभी अपनी डेयरी और पब्लिकेशन कम्पनी के हिसाब को चेक जरूर कर लेता था।
मै सुबह उठता और अपने खेतों में जाता और मजदूरों संग काम करता और उनके बीच खुश रहता। एक दिन मै अपने फार्म हाउस में पौधों को पानी दे रहा था कि गाड़ी का हार्न सुनकर चौकं गया।सामने देखा तो मेरी मां के साथ किरन गाड़ी से उतर रही थी। मै जब भी किरन को देखता तो मेरा प्रेम बाहर आने को आतुर हो जाता । मैंने खुद को सहज करने की कोशिश की ।और सब को अनदेखा कर पौधों को फिर से पानी देने में मशगूल हो गया।""बेटा रवि ...आपके ऑफिस से कोई आया है तुम्हें पूछ रही हैं""।माँ ने आगे बढ़ते हुए कहा 
मैंने पहले माँ की तरफ देखा और फिर किरन की तरफ""जी कहिये ...कैसे आना हुआ?" मैने किरन के सामने अनजान बनने की कोशिश करते हुए पूछा।
किरन मेरे बदले हुए मिज़ाज़ को देख कर पहले तो सकपका गयी मगर खुद को संतुलित करते हुए बोली""सर नेक्स्ट वीक   मेरी बड़ी बहन की शादी है आपको आना है "" और कहते हुए उसने मुझे शादी का कार्ड थमा दिया। मैंने फॉर्मेलिटी वश कार्ड को ओपन किया तो देखा की कार्ड के बीच में एक अलग छोटी सी पर्ची पर लिखा था ""सॉरी रवि ..हो सके तो लौट आओ""।
मै ने पर्ची को देख कर भी इग्नोर करने का नाटक किया और किरन की तरफ देखे बिना ही कहा""जी कोशिश करूंगा आने की"।मुझे डर था कि कहीं किरन को देख कर मेरा धैर्य टूट न जाये।और मै कमज़ोर न हो  जाऊं।
किरन जा चुकी थी,लेकिन मेरे मन के शोर को और भड़का दिया था। मै पौधों को पानी देना बंद कर के कुर्सी पर बैठ गया और फिर फ़फ़क कर रो पड़ा।काफी देर तक नम आँखे लिए बैठा रहा।और थोड़ी देर बाद मुझे सूकून मिला।जैसे तूफ़ान और भारी बारिश के बाद मौसम बिलकुल साफ हो जाता है।  एक बार फिर से मैंने खुद को मजबूत किया और अपने मन से किरन को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।
 


 



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Written by Arjun Allahabadi ki kahaniya