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चरित्रहीन...

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11 Jun '24
11 min read


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पूर्णिमा की रात थी।हर तरफ चांदनी छिटकी हुई थी।विधि यमुना नदी के किनारे पर बैठी, हाथ मे वाइन की बोतल लिए यमुना नदी की लहरों को निहार रही थी।पानी मे चांद का प्रतिबिंब देखते हुए वो अपनी ही सोंच में गुम थी।बीच -बीच मे वाइन के एक आध- घूंट भी गले से नीचे उतार लेती थी।आधी रात में उसे किसी बात की परवाह नही थी।रात के अंधेरे में बहती हवा की आवाज मानो उसे सुकून पहुंचा रही थी।अपनी सलवार को घुटनों तक हुए वो पैरो को पानी मे डाले रखी थी।उसकी चुनरी उड़ते हुए कहीं दूर निकल गयी थी मानो वह आजाद होना चाहती हो पर विधि को किसी की भी परवाह नही थी।दो -चार मनचले लड़के उसको सामने वाले पुल पर खड़े होकर घूर रहे थे,पर परवाह किसे थी।विधि की आंखों से कभी आंसू बहते तो कभी होठों पर मुस्कुराहट आ जाती।इस मनोरम चांदनी में उसका शरीर भी उसी चांदनी की तरह दमक रहा था।गालो पर फैले हुए काजल के बावजूद चेहरा इतना सुंदर कि कोई एक नजर में ही अपना दिल हार जाए।

        अचानक विधि का ध्यान भंग हुआ,किसी ने पुल से नीचे पानी में छलांग लगा दी थी।इतने में कुछ नाविक पानी मे कूदे और उसे खींच कर पानी से बाहर ले आये।विधि ने अपने बाल ठीक किये ,गालो पर से अपना काजल साफ किया और भीड़ की दिशा में आगे बढ़ गयी।देखा तो एक 18-19 साल की लड़की खुद में ही सिमटी हुई रोए जा रही थी ,दो चार पुलिस वाले जो वहां पर मौजूद थे उस लड़की पर चिल्लाए जा रहे थे।विधि अब आगे आ गयी।उसके तन पर चुनरी न होने से सामने खड़े दो आवारा लड़को की नजर उसके वक्ष पर ठहर गयी।विधि ने उनकी नजरो को देखा और फिर उनके सामने आ गयी।

"क्यो बे,कभी किसी लड़की को बिना दुपट्टे के नही देखा क्या?नही देखा तो बता दे और जितना मर्जी चाहे देख ले।गर्मी आ जाए तो तुझे ठंडा करने का इंतजाम भी है मेरे पास।,वैसे अपनी माँ के तो देखे ही होंगे,सेम टू सेम मेरा भी है।"लड़को की आंखों में झांकते हुए विधि बोली।विधि का चेहरा पास से देखने पर एक लड़के को कुछ याद आया और उसने दूसरे लड़के के कान में कुछ कहा,जिसे सुनकर वो लड़का बहुत जोर से घबरा गया।पलक झपकते ही दोनो लड़के वहां से भाग खड़े हुए।इतनी देर में उन पुलिस वालों ने भीड़ को हटा दिया।

"क्या नाम है तुम्हारा"उस लड़की के पास बैठकर उसके हाथ पर अपना हाथ रखकर विधि ने कहा।

इतनी देर से डरी -सहमी लड़की ने अपनेपन का स्पर्श पा कर चेहरा ऊपर किया।

"जी मीरा"कांपती हुई आवाज में उस लड़की ने जवाब दिया।

मीरा नाम सुनते ही विधि किसी सोंच में डूब गई।दूर पड़े अपने बैग में से शॉल निकालकर विधि ने मीरा को शॉल ओढाई और उसे पास की चाय की दुकान में ले गयी,जो मुसाफिरों के लिए हमेशा खुला रहता था।चाय पीते हुए विधि ने मीरा से बातचीत शुरू की।

“कहाँ रहती हो।”

"मेरा कोई घर नही है दीदी" सुबकते हुए मीरा बोली।

“आत्महत्या करने आई थी,जानती भी हो जिंदगी की कीमत।”

“मेरे पास और कोई रास्ता नही था दीदी।”

“ऐसे जिंदगी से हार नही मानते,तुम चाहो तो मुझे बता सकती हो,हो सकता है मैं तुम्हारी कुछ मदद कर पाऊँ,अगर दीदी बोला है तो बहन समझ कर बता दो”

विधि से अपनापन पाकर मीरा की आंखों से आँसू बहने लगे।

“मेरे मां -बाप बहुत गरीब थे।मैं पढ़ाई में बहुत अच्छी थी दीदी,सोंचती थी पढ़ -लिखकर कुछ बन जाऊंगी और अपने माँ -बाप को आराम की जिंदगी दूंगी।पर ऐसा कुछ हो ही नही पाया।पापा के दूर के रिश्तेदार एक रिश्ता लेकर आये,वो लोग काफी पैसे वाले थे।लालच में आकर मेरे बाप ने मेरी शादी एक 35 साल के शराबी आदमी से कर दी या यूं कहें तो मुझे 1 लाख रुपये में बेच दिया।ससुराल पहुंची तो वहां मेरी हालत वहाँ के नौकरों से भी बदतर थी,मुझे खरीद कर जो लाया गया था।दिन भर सबकी गुलामी करती और रात में पति की गलियां सुनकर अपना शरीर नुचवाती।शराब पीने के कारण मेरा पति मर गया और मैं विधवा हो गयी।मेरे ससुराल में अब मेरी जरूरत किसी को नही थी तो कुलटा,बदचलन बोलकर मुझे घर से धक्के देकर निकल दिया गया।वहां से मां बाप के घर गयी तो वो तो मुझे पहले ही बेच चुके थे।जिन मां-बाप को अपनी बेटी बेचने में लोक -लाज की याद नही आई ,उन्हें अब अपनी विधवा बेटी को घर मे रखने में लोक- लाज की चिंता थी।उन्होंने भी मुझे घर से निकाल दिया।अब तुम ही बताओ दीदी मैं क्या करूं।जहां भी गयी मुझे चरित्रहीन बोलकर अपमानित किया गया,बाहर भूखे भेडियो की कमी नही है ,हर वक्त लार टपकाते हुए शरीर नोचने के लिए तैयार रहते हैं।मैं नही जी सकती इस चरित्रहीन के दाग के साथ।”

 

             मीरा की बात सुनकर विधि ने एक गहरी सांस ली।वो मीरा को लेकर फिर उसी जगह आ गयी जहां कुछ देर पहले वो बैठी हुई थी।कुछ देर बाद विधि ने बोलना शुरू किया।

"चरित्रहीन ,बड़ा अजीब शब्द है न ,ये शब्द अगर किसी ने किसी लड़की को बोल दिया तो वो खंजर मारने से भी ज्यादा दर्दनाक होता है उस लड़की के लिए।चलो मैं तुमको एक कहानी सुनाती हूँ।

     

        एक लड़की थी बिल्कुल तुम्हारी ही तरह,आंखों में हजारों सपने बसाए हमेशा हंसती मुस्कुराती हुई।अपने माँ-बाप की चहेती थी।बस उसके घरवाले गरीब नही थे।भरा- पूरा परिवार था उसका।कहते हैं न कि वक्त और नसीब के आगे किसी की भी नही चलती ।अचानक से उसके पापा को हार्ट अटैक आया और वो दुनिया छोड़ कर चले गए।उसकी मां भी उस सदमे को बर्दाश्त न कर पाई और वो भी उसे अकेला छोड़कर चली गयी।उस लड़की के पास अब सिर्फ उसकी छोटी बहन थी।सारी दौलत पर राज हो जाने से उसके चाचा और चाची का बर्ताव बदल चुका था।वो लोग कई-कई दिन तक उसे भूँखा रखते थे।खुद की भूंख तो वो सह लेती थी पर अपनी बहन को भूंख से तड़पते देखकर उसकी आत्मा बिखर जाती थी।अपनी बहन को तड़पते देख एक दिन उसने बगावत करने की ठानी,पर उसे बुरी तरह से पीट कर कमरे में बंद कर दिया गया।उस लड़की का एक दोस्त था जिसे इन सबके बारे में पता था।आधी रात को वो चुपके से उनदोनो के लिए खाना लेकर आता था।एक  दिन उसे आते हुए किसी ने देख लिया ,और बिना सोंचे समझे उस लड़की को चरित्रहीन की उपाधि दे दी गयी।आधी रात को ही उसे घसीट कर घर से बाहर निकाल दिया गया।वो रोती रही ,चिल्लाती रही पर किसी को उस पर तरस नही आया।उसकी बहन को पकड़कर कमरे में बंद कर दिया गया।पूरे मोहल्ले में किसी ने उस पर रहम नही किया,ऊपर से उस पर फब्तियाँ कसी गयी।पूरी रात वो लड़की पास के एक मंदिर पर बैठी रही इस उम्मीद में कि शायद उसके घर वालों को उस पर तरस आ जाए।सुबह होने पर पता लगा कि उसकी 10 साल की बहन ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी।उसकी बहन की मौत का जिम्मेदार भी उसे ही ठहरा दिया गया।कुछ लोग जो उस लड़की की तरफ से बोलना चाहते थे,उसके परिवारवालों के रुतबे के आगे बोल न पाए।इतना तो वो समझ ही गयी थी कि सब पैसे का ही खेल है।अपनी बहन के मौत के गम में वो पूरे दिन उसी मंदिर के पास बैठी रही।रात हुई तो गांव के ही एक आदमी ने उसके साथ जबरजस्ती करने की कोशिश की,जब वो अपने मंसूबे में कामयाब न हो सका तो सारा इल्जाम उस लड़की पर ही लगा दिया।वो सामने पुल देख रही हो,जिंदगी और अपमान से हारकर वो भी उसी पुल से इस गहरे पानी में कूद गई थी।मौत को करीब देख कर भी उसे सिर्फ अपना अपमान और अपनी बहन याद आ रही थी।उसकी किस्मत ने उसे यहां भी धोखा दिया।एक भले इंसान ने उसे बचा लिया था।उस इंसान ने उसे जिंदगी की कीमत समझाई।उसने समझाया कि जिंदगी से हार मत मानो ,बल्कि उन सबको मुँह तोड़ जवाब दो जिन्होंने तुम्हारे साथ गलत किया है।उनकी बातों से हिम्मत लेकर उस लड़की ने ठान लिया कि वो अब हार नही मानेगी और कुछ भी करके अपने ऊपर से चरित्रहीन के कलंक को मिटाएगी।

कुछ दिन तक वो उसी आदमी के साथ रही।घर -घर जाकर काम करके उसने कुछ दिनों तक दो वक्त की रोटी का इंतजाम किया।वहाँ भी कुछ लोग उसे गिद्ध की नजरों से घूरा करते थे।किसी तरह अपनी आबरू को बचाते हुए उसने अपने लिए एक छोटे से कमरे की व्यवस्था कर ली थी,पर यह काफी नही था।उसे आगे बढ़ने के लिए पढ़ाई की जरूरत थी और पढ़ाई लिए रुपयों की,जिसे कमाना एक अकेली लड़की के बस की बात नही थी।

   अपने ऊपर से चरित्रहीन का दाग हटाने के लिए आखिर उसे चरित्रहीन ही बनना पड़ा।पर उसे अब किसी की परवाह नही थी।किसी तरह उसने कॉलेज में दाखिला लिया।कॉलेज में उसने बॉयफ्रेंड भी बनाए,क्योंकि अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए उसे खर्चे की जरूरत थी।कभी चोरी करती तो कभी किसी लड़के को अपने प्रेमजाल में फँसाती।एक दिन उसने एक आई पी एस अफसर को देखा जो एक 30 साल की महिला थी।क्या रुतबा था उसका,सभी उसके सामने सर झुकाए हुए थे।सभी की नजरों में उसके लिए इज़्ज़त थी।यही तो वो चाहती थी।उसी पल उसने फैसला लिया कि वो भी आई पी एस ही बनेगी,चाहे उसके लिए उसे कुछ भी करना पड़े।राह चुन तो ली थी पर राह आसान नही थी।इस सफर में उसे पढ़ाई और पैसों दोनो की जरूरत थी।उसने एक कोचिंग सेंटर में दाखिला लिया और वहां की फीस उसके मालिक के साथ सोकर चुकाई।पहले दिन जब वो उस आदमी के साथ सोई थी ,उसकी आत्मा ने उसका साथ छोड़ दिया था,पर उसकी जिद,,उसने कभी उसका साथ न छोड़ा।उसके बाद तो ये सब आम बात हो गयी।आखिरकार उसकी मेहनत रंग लाई और वो आई पी एस बन गयी।आई पी एस बनने के बाद वो सबसे पहले अपने घर गयी ,जहां से उसे धक्के दे कर बाहर निकाला गया था।वहाँ सभी की नजरें उसके सामने नीची थी।जो लोग कल उसको कुलटा ,वैश्या न जाने क्या -क्या बोल रहे थे,आज वो सभी उसकी तारीफ करते नही थक रहे थे।उसने हर एक की आँखों में झांका और हर जगह उसे अपने लिए इज़्ज़त दिखी।जिन परिवार वालो ने उसे घर से निकाल दिया था, आज वो ऐसे पेश आ रहे थे जैसे उनसे ज्यादा प्यार तो उसे कोई करता ही नहीं।अब वो चरित्रहीन होकर भी चरित्रहीन नहीं थी।इसके बाद वो हर एक शख्स से मिली जिसने उसकी बेज्जती की ,जिसने उसको अपशब्द कहा ,सबकी नजरें उसके सामने झुकी हुई थी।वो हर उस इंसान से मिली जिसके साथ वो सोई थी ,पर वो सब उसे नजर उठा कर देखने से भी डर रहे थे।चरित्रहीन बनकर उसने खुद पर से चरित्रहीन का दाग मिटा दिया था।आखिर उसने अपनी जिद पूरी कर ली।जब कभी उसे अपने गलत कामो पर पछतावा होता है वो यहाँ इसी जगह बैठकर अपने पुराने दिन याद करती है और अपने को विश्वास दिलाती है कि उसने जो किया वो सही था।आजकल की दुनिया मे सर उठा कर जीने के लिए रुतबा चाहिए ,फिर चाहे आप खुद कितने भी गलत क्यों न हो। बस उसे एक बात का हमेशा पछतावा रहता है कि वो अपनी बहन को बचा नहीं पाई।जानती हो.......उसकी बहन का नाम भी मीरा था।वो भी बिल्कुल तुम्हारी तरह  मासूम थी ।अगर वो जिंदा होती तो बिल्कुल तुम्हारी तरह ही होती।

   मैं बस इतना कहना चाहती हूँ ,कि उठो और इस दुनिया से लड़ो ।अपनी पहचान बनाओ और उन सब का मुंह बंद कर दो जिन्होंने तुम्हारा अपमान किया है।ये चरित्रहीन का दाग तभी छूटेगा जब तुम खुद इसे हटाने का साहस रखोगी।तुम्हारे पास खोने को कुछ नहीं है तो डर किस बात का ।"

 

विधि की बातें सुनकर मीरा को बहुत हिम्मत मिली।उसने फैसला कर लिया कि वो अब हार नहीं मानेगी।

"मैडम,वो गाड़ी रेडी है।"एक पुलिस वाले कि आवाज सुनकर मीरा का ध्यान टूटा।मीरा को अपना कार्ड थमा कर विधि उठ खड़ी हुई।

"अगर कभी मेरी जरूरत पड़े तो बेझिझक मेरे पास आ जाना।"विधि ने मीरा के गाल पर हाथ रखते हुए कहा।

मीरा ने उस कार्ड को देखा 

“आई पी एस विधि शुक्ला...”

मीरा हैरानी से कभी विधि को देखती तो कभी उस कार्ड को।"इसका मतलब कहानी वाली लड़की विधि खुद हैं।"

"तुम चाहो तो मेरे साथ चल सकती हो,वादा करती हूं कि तुम्हे चरित्रहीन नहीं बनने दूंगी।"विधि ने मुड़ते हुए मीरा से कहा।

हाँ में सर हिला कर मीरा दीदी बोलते हुए विधि के गले लग गयी।विधि ने अपने हाथ में पकड़ी हुई वाइन की बोतल को देखा और मुस्कुरा कर उसे दूर फेंक कर मीरा को अपने साथ ले गयी।आज उसे अपनी छोटी बहन वापस मिल गयी थी।

  (समाप्त) 

                                             आस्था..

 

       

Category:Stories


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Written by Himanshi Saxena